Thursday, 11 October 2012

प्रतिष्ठा का बोझ

 प्रतिष्ठा का बोझ बड़ा भरी होता है, यह अन्ना को देख कर समझा जा सकता है। अन्ना बेदाग रहना चाहते हैं। उनमें साहस  का अभाव  है। वे सम्मानित बने रहना चाहते हैं। राजनीति  में आने पर बदनामी की स्थिति कभी कभी बन सकती है। .दरअसल अन्ना के पास देर तक और दूर तक लड़ने की हिम्मत अब नहीं है। सम्मान की चाहत में संघर्ष छोड़ देना कायरता और समझौता है। यह भी साफ  है कि अन्ना विजनरी परसन नहीं हैं। अगर राजनीति सब कुछ तय करती है तो उसके ज़रिये पूरे देश की सेवा या भलाई उन्हें करनी चाहिये या यह मान लेना चाहिए   कि उनमें अब इतनी बड़ी समस्याओं से जूझने की हिम्मत और समझ नहीं है।

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