यह समझना बड़ा कठिन है कि कब इन्सान भगवान बन जायेगा और कब शैतान बन जायेगा। इन
दोनों रूपों में एक ही आदमी को अलग-अलग समय पर देखा जा सकता है। शायद जब आदमी प्रेम
और आनंद से भरा हुआ होता है तब वह भगवान जैसे काम करता है और जब वह नकारात्मक
भावों से भरा होता है तब उससे शैतान वाले काम होते हैं। बहरहाल यह पहेली शाश्वत है और बहुत
कठिन है। अच्छे और बुरे भाव आदमी में हरदम मौजूद रहते हैं, मात्रा कम ज्यादा ज़रूर होती है।
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