जो लोग समाज में चल रही अंधी दौड़ में कोशिश करके शामिल होते हैं वे अपनी individuality खो देते हैं। ज्यादा से ज्यादा उपभोग की संस्कृति तो बुरी है ही, अपनी individuallity ख़त्म करना तो पाप है। सोशलाइजेशन, रवायात, तालीम इन सभी को उतना ही किसी को ढालना चाहिए जहाँ तक उसकी निजता
समाप्त न हो।
समाप्त न हो।
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